Gender Pay Gap: पुरुषों और महिलाओं के बीच में कमाई का अंतर या समाज का दोहरा मापदंड...
- Rishabh Raj Karn

- Dec 13, 2023
- 8 min read
Updated: Feb 6, 2024
Gender Pay Gap: पुरुषों और महिलाओं के बीच में कमाई का वो अन्तर है, जो पिछले दशकों में यह अंतर विश्व और भारत में मुश्किल से कम हुआ है। लेकिन आखिर कब समान काम के लिए समान वेतन पाएंगी महिलाएं? इस लेख में, हम इसी मुद्दे पर करीब से नज़र डालेंगे।

आज भले ही महिलाएं पुरुषों जितना काम करें, लेकिन आज भी लैंगिक वेतन अंतर देश और दुनिया की सबसे बड़ी विषमताओं में से एक बना हुआ है। दुनिया भर में पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले महिला कर्मचारी के वेतन में काफी ज्यादा अंतर दिखाई देता है।
Gender Pay Gap यानि लैंगिक वेतन अंतर का अर्थ है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कम वेतन पाती हैं, जबकि वे व्यावसायिक क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबर काम करती हैं। इसका प्रमुख कारण हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ लैंगिक वेतन अंतर को बनाए रखने वाले धन-संपन्न वर्ग, सांस्कृतिक रूढ़ियां, और लिंगीय भेदभाव की जड़ी-बूटी दृढ़ परंपराओं का असर है।
लैंगिक वेतन अंतर एक ऐसी समस्या है जिसका दुनिया भर में महिलाओं को सामना करना पड़ता है। यह एक ऐसा अंतर है जो पुरुषों और महिलाओं के बीच समान काम करने पर मिलने वाले वेतन में पाया जाता है। समाज में समान अधिकार और समानता का जोर दिया जाता है, लेकिन महिलाओं के वेतन में अंतर आज भी एक गंभीर मुद्दा है। यह अंतर एक समान काम करने वाले पुरुषों और महिलाओं के बीच मानव अधिकार और समानता की दृष्टि से एक निरंतर चुनौती है। हाल ही में समान कार्य के लिए समान वेतन की मांग करते हुए आइसलैंड की प्रधानमंत्री (कैटरीन याकोबस्डोटिर) सहित पूरे देश की महिलाओं ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल किया।
लिंग के आधार पर होता भेदभाव
आज भी समाज में महिलाओं के साथ शिक्षा, कौशल या अनुभव जैसी व्यक्तिगत विशेषताओं के आधार पर तो भेदभाव होता ही है, लेकिन लिंग के आधार पर भी भेदभाव किया जाता है। यह भी Gender Pay Gap का एक बड़ा कारण है। जिसके कारण महिलाओं को पुरुषों जितना काम करने के बावजूद भी कम वेतन दिया जाता है। नारीवादी व्यवसायों और उद्यमों में महिलाओं के काम का कम मूल्यांकन किया जाता है। वहीं जो महिलाएं मां नहीं हैं, उनकी तुलना में मदर्स को बहुत कम वेतन दिया जाता है।

Gender Pay Gap एग्जिस्ट करने का कारण।
इनमें कई कारणों में से एक कारण है हमारा पितृसत्तात्मक समाज। अक्सर हमारे समाज में 22 से 44 वर्ष की कामकाजी महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है, कि वे अपने व्यावसायिक काम के साथ ही साथ शादी करके परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों का भी वहन करें। घर, परिवार और बच्चों के जिम्मेदारियों के कारण ये महिलाएं अपने व्यावसायिक क्षेत्र में प्रत्येक सप्ताह कम घंटे ही काम कर पाती है और इन्हीं कारणों से उन्हें वेतन भी कम ही प्राप्त होता है। जबकि एक समान उम्र की वे महिलाएं जिनके ऊपर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियां नहीं होती है, वह अक्सर उन महिलाओं की तुलना में हर सप्ताह घंटे काम करने की संभावना अधिक होती है, जिससे उन्हें अधिक वेतन की प्राप्ति होती है। हालांकि आँकड़े बताते हैं कि यह प्रभाव या तो पूर्ण रूप से मामूली है या कई के लिए अल्पकालिक है।
वहीं दूसरी ओर, हमारे समाज में पुरुषों पर इस तरह की किसी भी जिम्मेदारियों की पाबंदियां नहीं होती है। जिसके कारण वह अपने व्यावसायिक क्षेत्र के कार्यों में अधिक से अधिक समय दे पाते हैं। जिसके कारण उन्हें अक्सर एक महिला की तुलना में अधिक वेतन का भुगतान किया जाता है। एक तरफ तो यह व्यावसायिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को कम करता है और दूसरी ओर लिंग वेतन अंतर को बढ़ावा देता है।
इसका दूसरा बड़ा कारण यह है कि कंपनियों में उच्च स्तर पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है। इसका मतलब यह है कि उच्च स्तर के पदों पर बैठे पुरुष ही यह तय करते हैं कि एक महिला को क्या और कितना भुगतान किया जाएगा। महिलाओं को सलाहकार भी ही कम मिलते हैं। पिछले साल आईआईएम-ए ने जो अध्ययन किया था उससे पता चलता है कि भारत में कंपनियों के वरिष्ठ प्रबंधन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 7 प्रतिशत है जो शीर्ष प्रबंधन स्तर पर और भी कम होकर लगभग 5 प्रतिशत हो जाता है।
भारत में Gender Pay Gap के मुद्दे को जो उलझाता है, वह इसमें योगदान देने वाले सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जैसे कई कारक हैं।

भारत में वेज गैप की सीमा क्या है?
आज जब हम वैश्विक आर्थिक विकास की बात करते हैं, तो भारत का जिक्र किए बिना नहीं रह सकते हैं। इसका कारण यह है कि हमारा देश सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है। इसके श्रम बाजार में होने वाले आनुपातिक सुधार और आर्थिक प्रगति, आगे आर्थिक विकास और इससे होने वाले अन्य लाभों को बढ़ावा देता है। हालांकि, हैरान करने वाली बात यह है कि देश के कामकाजी बाजार में महिलाओं की स्थिति सुधरती नजर नहीं आती है।
अब बताइए हम कह तो रहे हैं कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में प्रगति की है। भारत की बेटियों ने तरक्की की है, लेकिन असमानता अभी भी मौजूद है। हम इस साल 77वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, लेकिन आजादी के इस अमृत महोत्सव में आज भी नारी के साथ हो रहे भेदभाव पर आंखें मूंदें हुए हैं।
भारत में जेंडर के बीच में वेज गैप सबसे ज्यादा है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 के अनुसार, आज भी भारतीय महिलाओं को पुरुषों की आय का लगभग पांचवां हिस्सा दिया जाता है। प्रतिशत की बात करें, तो महिलाओं को औसतन पुरुषों की आय का 21% भुगतान किया जाता है।
भारत में, लिंग वेतन अंतर "वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम" के अनुसार 27% है, जिसका मतलब यह है कि भारतीय महिलाएं पुरुषों की तुलना में औसतन 27% कम कमाती हैं। पिछले साल आईआईएम-अहमदाबाद ने जेंडर पे गैप पर एक अध्ययन किया था। इसमें पता चला था कि इंडिविजुअल कॉन्ट्रिब्यूटर लेवल पर महिलाएं समान भूमिकाओं में काम करने वाले पुरुषों की तुलना में केवल 2.2% कम कमाती हैं। वहीं, मैनेजर/सुपरवाइजर के लिए यह अंतर बढ़कर 3.1% और निदेशकों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए 4.9 - 6.1% हो जाता है।
इसके अलावा, विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 के अनुसार, भारत में पुरुषों की लेबर इनकम 82% है, जबकि महिलाओं की कमाई मात्र 18% है।
भारत की जेंडर पे गैप स्कोर पर रैंकिंग
"वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम" की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2022 के मुताबिक भारत का स्कौर हैरतंगेज करने वाला है। भारत का वैश्विक जेंडर गैप स्कोर जो लैंगिक समानता को मापता है, वह सिर्फ 0.629 है। इस स्कोर की बदौलत भारत पिछले 16 वर्षों में सातवें सर्वश्रेष्ठ स्कोर तक पहुंचा है। इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों में कुल मिलाकर सुधार हुआ है। विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों और प्रबंधकों जैसे पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। वहीं, जेंडर पे गैप में कमी दिखी है। हालांकि, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में महिलाओं के लिए कुछ खास नहीं बदला है। राजनीति में महिलाओं की भूमिका में कमी आई है, क्योंकि पिछले 50 वर्षों में महिलाओं की भागीदारी इस क्षेत्र में कम रही है। हालांकि अभी हाल ही में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित महिला आरक्षण विधेयक के पारित हो जाने से इस क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।

रोजगार के अवसरों में असमानताओं को दर्शाती OXFAM India की डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट।
ऑक्सफैम इंडिया की हाल ही में आई "इंडिया डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट 2022" में पाया गया है कि पुरुषों के समान शैक्षणिक योग्यता और कार्य अनुभव के बावजूद भारत में महिलाओं के साथ सामाजिक पूर्वाग्रह के कारण लेबर मार्केट में भेदभाव किया जाता है।
इतना ही नहीं, रिपोर्ट में बताया गया कि 2020-21 के बीच भारत के लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी केवल 25.1 प्रतिशत है। जबकि 2004-05 की तुलना में, इस संख्या में 42.7 प्रतिशत से भारी गिरावट देखी गई। इसमें यह भी 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन व्यक्तियों की संख्या पर भी प्रकाश डाला गया है जो नियमित वेतनभोगी कर्मचारी या स्व-रोजगारी थे। इसमें भी पुरुष 60 प्रतिशत और महिलाएं केवल 19 प्रतिशत थीं। डेटा ने लिंग के बीच रोजगार के अवसरों में असमानताओं को उजागर किया।
आंकड़ों से देश में पुरुषों और महिलाओं के औसत वेतन का भी पता चलता है। जहां पुरुषों की औसत कमाई 19,779 रुपये रही है, वहीं महिलाओं की औसत कमाई 15,578 रुपये ही रही है।
भले ही पिछले वर्षों की तुलना में अंतर कम हो गया है, फिर भी हमें देश में लैंगिक वेतन और अवसर के अंतर को पाटने के लिए अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है।
कैसे उम्र के साथ लिंग वेतन अंतर बढ़ता जाता है?
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, लैंगिक वेतन अंतर यानि जेंडर पे गैप भी बढ़ता जाता है। लैंगिक वेतन अंतर में सबसे ज्यादा वृद्धि 35 से 44 साल की उम्र की महिलाओं में देखी जाती है। 2022 में, 25 से 34 साल की महिलाओं को समान उम्र के पुरुषों की तुलना में लगभग 92% का ही वेतन मिला, लेकिन यह अंतर 35 से 44 साल की महिलाओं में और बढ़कर 89% हो गया। वहीं, 45 से 54 साल की महिलाओं को उसी उम्र के पुरुषों की तुलना में 83% का ही वेतन मिला। 55 से 64 वर्ष की आयु वाली महिलाओं को तो सिर्फ 79% का ही वेतन मिला।

महिला के शिक्षा में वृद्धि के बावजूद लैंगिक वेतन अंतर को पाटने की धीमी होती गति।
कम से कम स्नातक की डिग्री प्राप्त करने में महिलाओं की हिस्सेदारी 1982 के बाद से लगातार बढ़ी है - और यह पुरुषों के अनुपात में अधिक है। 1982 में, 25 वर्ष और उससे अधिक उम्र की 20% कामकाजी महिलाओं के पास ही स्नातक की डिग्री या उच्च स्तर की शिक्षा थी, जबकि इसी उम्र में 46% कामकाजी पुरुषों के पास स्नातक की डिग्री या उच्च स्तर की शिक्षा थी। 2022 तक, 48% कामकाजी महिलाओं के पास कम से कम स्नातक की डिग्री थी, जबकि पुरुषों में यह आँकड़ा 61% के पास ही था। फिर भी, महिलाओं को 2002 से 2022 तक उतना वेतन अंतर नहीं मिला जितनी वृद्धि 1982 से 2002 तक हुआ था।
कुछ हद तक, यह इस बात से भी जुड़ा हो सकता है कि हाल के दशकों में महिलाओं और पुरुषों के लिए कॉलेज जाने से होने वाले लाभ कैसे बदल गए हैं। स्नातक की डिग्री या उच्च स्तर की शिक्षा से श्रमिकों की कमाई में बढ़ोतरी होती है - और इसमें 1980 के दशक के दौरान से तेजी से बढ़ोत्तरी देखी गई है। लेकिन इस दिशा में वृद्धि समय के साथ धीमी हो गई और 2010 के आसपास रुक सी गई है। इससे महिलाओं की कमाई में सापेक्ष वृद्धि कम होने की संभावना है।
हालाँकि शिक्षा में लाभ ने महिलाओं की औसत आय में वृद्धि की है और पूर्ण रूप से लैंगिक वेतन अंतर को कम किया है, लेकिन स्नातक की डिग्री प्राप्त महिलाएं अन्य महिलाओं की तुलना में अपने पुरुष समकक्षों के साथ वेतन समानता के करीब नहीं हैं। 2022 में, कम से कम स्नातक की डिग्री वाली महिलाओं ने कॉलेज स्नातक पुरुषों की तुलना में 21% कम कमाई की, और वहीं जिन महिलाओं के पास स्नातक से उच्च स्तर की शिक्षा थीं, उन्होंने समान स्तर की शिक्षा वाले पुरुषों की तुलना में 19% कम कमाई की। यह वेतन अंतर को पाटने में सभी शिक्षा स्तरों की महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को रेखांकित करता है।
जैसे-जैसे हाल के दशकों में महिलाओं ने अपनी शिक्षा के स्तर में सुधार किया है, उन्होंने प्रबंधकीय, व्यवसाय और वित्त, कानूनी और कंप्यूटर, विज्ञान और इंजीनियरिंग जैसे उच्च-भुगतान वाले व्यवसायों में रोजगार में अपनी हिस्सेदारी भी बढ़ाई है। 1982 में, प्रबंधकीय व्यवसायों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 26% थी। वहीं 2022 तक उनकी हिस्सेदारी बढ़कर 40% हो गई है। महिलाओं ने सामाजिक, कला और मीडिया संस्थाओं में भी अपनी उपस्थिति काफी हद तक बढ़ाई है। इसी अवधि में, कई कम-भुगतान वाले क्षेत्रों, जैसे प्रशासनिक सहायता नौकरियों और भोजन की तैयारी और सेवा जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी में काफी गिरावट देखी गई है।

पुरुषों के मुकाबले ज्यादा काम करती है महिलाएं।
विडंबना यह है कि माना जाता है महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम काम करती हैं, जबकि सच्चाई इससे अलग है। हम अक्सर उस काम को गिनना भूल जाते हैं जो न सिर्फ Unpaid होता है बल्कि अनदेखा भी कर दिया जाता है।
“राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण” के अनुसार, महिलाएं घर पर रहकर भी प्रतिदिन 299 मिनट अधिक Unpaid घरेलू काम करती हैं, जबकि पुरुष केवल 97 मिनट खर्च करते हैं। लगभग 71% पुरुषों की तुलना में 15-59 वर्ष की आयु की केवल 22% महिलाएं Paid कार्य करती हैं। अब अगर आप और हम महिलाओं द्वारा किए जाने वाले Unpaid काम को गिनने लगे, तो Gender Pay Gap की सीमा और भी अधिक बढ़ जाएगा।
विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में प्रस्तुत कम होता लिंग अंतर हमारी आशा की किरण है और आगे बढ़ते हुए हम केवल महिलाओं के लिए एक समान कामकाजी दुनिया की चाह रखते हैं। Gender Pay Gap को कम करने के लिए समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन आवश्यक है। अगर हम देश और दुनिया के आर्थिक विकास की चाह रखते हैं, तो इस अंतर को कम करना हमारे लिए काफी ज्यादा जरूरी है।









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